आतंकवाद या फ़िर ताकत की भूख | सीरिया |

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जब भी दुनीया मे आतंकवाद को लेकर चर्चा होती है अमरीका के 9/11 और  फ़्रांस के उपर हुए हमलो से आगे विश्व पटल बढ़ ही नही पाता । हा इस बात से इंकार नही कर सकते की अब बात भारत सरिया और बाकी के विश्व को लेकर भी होती है । लेकीन सवाल यह है की इस तरह का भेद भाव क्यो आतंकवाद पर अमरीका झूठा सा क्यों लगता है?

जाने कब से  ही भारत चीख चीख कर दूनिया को अपनी दर्द  भडी दास्ता सुनाने कि कोशिश कर रहा था , पर विश्व पटल इस ओर जैसे ध्यान देना ही नही चाह रहा था । भारत मे जाने कितने ही मासूमो कि जाने गई कीतने ही फौज़ी बेमतलब शहीद हो गए कारण सिर्फ और सिर्फ आतंकवाद । कभी अफगान रोता तो कभी कोइ और |

कही ना कही कोई माने ना माने आतंकवाद को इस उचाई तक पहुचाने मे एक हाथ विश्व के अमीर और विकसित देशों का भी है (यहाँ मेरा मतलब सिर्फ और सिर्फ अमेरीका से है )।जिंहोने कही ना कही अपना मतलब निकालने के लिए अपनी पैठ जमाने के लिए सामने से या पीछे से आतंकवाद को भरपूर सहयोग दिया । सद्दामहुसैन को कमज़ोर करने के लिए अफगान और तालिबान मे अपनी B TEAM या कह सकते है अपने सहयोग के लिए वहा के  युवाओ के हाथ मे बंदूक दे दिया । ठीक वैसे ही जैसे 1980 में ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए कैमिकल हथियार देकर अमेरिका ने सद्दाम को सद्दान हुसैन बनाया| सद्दाम को खत्म करने के पीछे कारण साफ था , स्द्दाम ताकतवर होने लगा था जो कही ना कही अमेरिका के हितों के खिलाफ हो रहा था । अमेरिका के इस ताकत के भूख ने जन्म दिया “ओसामा बिन लादेन” को , परीणाम स्वरूप वही हुआ जो निश्चित था , आतंक्वाद कभी किसी का नही हुआ  “लादेन” ने भी अपने जन्म दाता अमेरीका को भी नही छोड़ा |

9\11 के रूप मे छूरा घोप ही दीया । अमेरीका को अब दर्द का अनूभव होने लगा । उसने लादेन से बदला लेने  के चक्कर मे जाने कितने ही जाने ले ली । और अंततः लादेन मारा गया । और इसे दूनिया कि आतंकवाद पर जीत  का नाम दे दिया । फिर नाम आता है फ्रांस का ऐसा नही है कि मोहब्बत के इस देश को आतंकवाद की मार झेलनी नही पड़ी । इस छोटे से देश को भारत कि ही तरह अनेको मार झेलना पड़ा । बस हुया यह कि बेचारा यह देश बदला नही ले पाया ।पर ऐसा नही है की  इसको लेकर कोई चर्चा नही हुई , चर्चा नही चर्चाए हुई ।परंतु   सवाल यह है की क्या दूनिया का मतलब सिर्फ अमेरिका है और कार्येवाई तभी होनी चाहिए जब अमेरिका घायल हो ?

अब भी भारत पाकिस्तान की आतंक के खिलाफ सबूत दे दे कर परेशान था यकीन दीलाने के लिए दर दर की ठोकड़े खा रहा था । परंतू किसी को क्यो कोई फर्क पर रहा था  । अमेरिका और बाकी देश पाकिस्तान को उपर उपर डाट लगा कर छोड़ देते । भारत पूरे विश्व से कहता रहा पाकिस्तान को आर्थीक सह्योग ना दे , क्योंकि कही ना कही इससे पाकिस्तान के “नाजयज़ औलाद” आतंक्वाद को पोषण मिल रहा था । विश्व पटल ने एक ना सुनी । अब जब पाकिस्तान अमेरिका के प्रतीस्पर्धी के हक मे बोलने लगा और उसकी गोद मे जाकर बैठ गया , अ‍मेरिका के पाव के नीचे से ज़मीन खीसक गई । अब अमेरिका भी उसे अलग कराने मे लग गया , और फ़िर आखिर कार पाकिस्तान को अलग करने की पहल हो ही गई  |

अब हम सीक्के के दूसरी  के दूसरी ओर अगर देखे तो मेरे मस्तिस्क मे सवाल यह कोंध रहा है “ क्या यह जीत भारत कि है ? क्या भारत/विश्व आतंक्वाद के विरूद्द जीत रहा है ? अथवा बात कूछ और ही है ?” अगर हम नज़र सीरिया की ओर करे और गौर से देखे तो मामला थोड़ा साफ होता दिखता है । सवाल  कम होते हैं ।

विश्व के दो सबसे ताकतवर देश रूस ओर अमेरिका सीरिया कि परेशानी को मिटाने मे एक दूसरे को पीछे करना चाह्ते हैं । नातीज़ा क्या सामने आ रहा है वो किसी से छूपा नही है , “ गेहू के साथ घून भी पिस रहा है “ आतंक्वादी खत्म हो रहे हैं या नही यह तो नही पता परंतू खूद को ताकतवर बताने वाले लोग वहा के मासूमो को पक्का खत्म कर रहे है । यहा अमेरिका खूद को सबका कष्ट निवारक दीखाना चाह्ता है, क्या हमारा ध्यान इस ओर गया कि सीरिया कि इस परेशानी के पिछे भी अमेरीका ही है । दरअसल अमेरिकी सेना 2011 में जब इराक से लौटी, तब तक वो इराकी सरकार को बर्बाद कर चुकी थी | सद्दाम मारा जा चुका था | इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से तबाह हो चुके थे और सबसे बड़ी बात ये कि वो इराक में खाली सत्ता छोड़ गए थे | संसाधनों की कमी के चलते तब बगदादी ज्यादा कामयाब नहीं हो पा रहा था | हालांकि इराक पर कब्जे के लिए तब तक उसने अल-कायदा इराक का नाम बदल कर नया नाम आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक रख लिया था| बगदादी ने सद्दाम हुसैन की सेना के कमांडर और सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया| इसके बाद उसने शुरुआती निशाना पुलिस, सेना के दफ्तर, चेकप्वाइंट्स और रिक्रूटिंग स्टेशंस को बनाना शुरू किया| अब तक बगदादी के साथ कई हजार लोग शामिल हो चुके थे, पर फिर भी बगदादी को इराक में वो कामयाबी नहीं मिल रही थी| इराक से मायूस होकर बगदादी ने सीरिया का रुख करने का फैसला किया| सीरिया तब गृह युद्ध झेल रहा था । पहले चार साल तक सीरिया में भी बगदादी को कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली। अलबत्ता इस दौरान उसने एक बार फिर से अपने संगठन का नाम बदल कर अब आईएसआईएस (इस्लामिकस्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) कर दिया था। जून 2013 को फ्री सीरियन आर्मी के जनरल ने पहली बार सामने आकर दुनिया से अपील की थी कि अगर उन्हें हथियार नहीं मिले तो वो बागियों से अपनी जंग एक महीने के अंदर हार जाएंगे।
इस अपील के हफ्ते भर के अंदर ही अमेरिका, इजराइल, जॉर्डन, टर्की, सऊदी अरब और कतर ने फ्री सीरियन आर्मी को हथियार, पैसे, और ट्रेनिंग की मदद देनी शुरू कर दी। इन देशों ने बाकायदा सारे आधुनिक हथियार, एंटी टैंक मिसाइल, गोला-बारूद सब कुछ सीरिया पहुंचा दिया और बस यहीं से आईएसआईएस के दिन पलट गए। दरअसल जो हथियाऱ फ्री सीरियन आर्मी के लिए थे, वो साल भर के अंदर आईएसआईएस तक जा पहुंचे क्योंकि तब तक आईएस फ्री सीरियन आर्मी में सेंध लगा चुका था और उसके बहुत से लोग उसके साथ हो लिए थे। साथ ही सीरिया में फ्रीडम फाइटर का नकाब पहन कर भी आईएस ने दुनिया को धोख दिया। इसी नकाब की आड़ में खुद अमेरिका तक ने अनजाने में आईएस के आतंकवादियों को ट्रेनिंग दे डाली।

जैसे अमेरिका की मदद की वजह से ओसामा बिन लादेन  अल-कायदा और 1980 में ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए कैमिकल हथियार देकर अमेरिका ने सद्दाम को सद्दान हुसैन बनाया का जन्म हुआ | ठीक वैसे ही सीरिया के फ्रीडम फाइटर को अमेरिका ने हथियार और ट्रेनिंग दी और अब वही फ्रीडम फाइटर आईएसआईएस के बैनर तले लड़ रहे हैं|

क्या अब भी हमे यही सोचना चाहिए की आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई शुरू हो गई है ? अथवा इस ताकत की भूख में अमेरिका ने दुनिया को बर्बाद कर दिया ?

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