दहेज़: स्त्री जीवन पे अभिशाप

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बेटी घर की लक्ष्मी,
घर की खुशहाली हैं,
प्यारी-सी,चंचल-सी,
अपने माता-पिता की बिटिया रानी हैं।

बचपन मे शरारत करती,
युवावस्था मे हमको समझाती हैं,
कभी अगर हम हो जाये दु:खी,तो,
हमको हिम्मत देती हैं।

हर काम,हर जिम्मेदारी,
बखूबी निभाती हैं,
पढ़ने-लिखने से लेकर,रसोई तक,
ये हर काम में अव्वल होती हैं।

धीरे-धीरे बडी है जाती,
शादी की उम्र हो आती हैं,
फिर शादी कर,बाबुल का घर छोड़,
ये ससुराल चली जाती हैं।

अपने सास-ससुर को माता-पिता,
और,
देवर को छोटा भाई समझती,
रखती सबकी खुशी ख्याल,
हर रिश्ता बखूबी निभाती हैं।

फ़िर भी,
न रखते इसें खुश,
सब इसको खरी-खोटी सुनाते हैं,
दहेज़ के नाम पे,
सब मिलके इसे सताते हैं।

हर रोज़,हर घड़ी,
इसका मानसिक उत्पीड़न करते,
न खाने को देते,
दिनभर बस,इससे काम करवाते हैं,
गलती-से-भी-अगर-कोई-गलती हो जायें, तो,
सब मिलके इसको मारते हैं,

अंत मे अगर कुछ न होता,
न होती माँगें पूरी, न मिलता दहेज़,
तो इसकी हत्या कर देते,
घटना को आत्महत्या दिखाकर,
अपने बेटे की दूसरी शादी करा देते हैं।

थोड़ी-सी भी शरम नहीं,इन दरिंदो को,
धन-दौलत के ये लोभी हैं,
इंसानियत थोड़ी-सी भी नहीं इनमें,
पता नहीं इनके घर मे भी,बेटी कैसे पैदा होती हैं?

क्या किसी मासूम की ज़ान से ज़्यादा कीमती,
गाड़ी, बँगला और पैसा हैं?

गुस्सा आता है मुझें इन नीच लोगों पर,
जो ऐसी हरकत करते हैं,
ज़ीने का नहीं इन्हें कोई हक,
क्योंकि,
इंसान नहीं,
हैवान है ये।।

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One thought on “दहेज़: स्त्री जीवन पे अभिशाप

  1. furtdsolinopv says:

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