दायरे

खड़े है कबसे इन इमारतों के पीछे, 

जिसे समाज दायरे कहता है,

ज़रा कदम बाहर रख कर देख 

ए-कैदी, 

वहाँ भी तेरे जैसा इंसान ही रहता है। 

 

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